मजदूर को रोजगार से ज्यादा मनी मैनेजमेंट की जरूरत: सतीश की कहानी
23 Jun, 2022
File: pexels.com
यह कहानी 32 साल के सतीश की है। सतीश छत्तीसगढ़ के बालूदा बाजार के पास, एक गांव का रहने वाला है।
कहता है कि बालूदा बाजार में एक दिन की बेलदारी के लिए सिर्फ 150 रुपया मजदूरी मिलती है। महज 150 रुपए में क्या ही होता है। ऊपर से दो बेटे और एक बेटी की जिम्मेदारी। इसलिए एक पहचान वाले की सिफारिश से जम्मू शहर के एक ठेकेदार के यहां काम करने चला आया। यहां उसे एक दिन की बेलदारी के लिए 500 रुपए मिलते हैं। काम भी हर रोज मिल जाता है।
लेकिन यहां की दूसरी परेशानियां हैं। सुबह 8 बजे से शाम के 5 बजे तक काम करते हैं। बीच में एक से डेढ़ घंटे का ब्रेक मिलता है, जिसमें खाना और आराम दोनो करके फिर से काम के लिए तैयार हो जाते हैं। सुनने में लगेगा की सात-साढ़े सात घंटे तो ज्यादा नहीं हैं। लेकिन यहां बात जम्मू की हो रही है, कश्मीर की नहीं। जम्मू की गर्मी दिल्ली से कम नहीं है। ऐसी गर्मी में एक साधारण आदमी दो किलोमीटर पैदल ना चल पाए।
मैने पूछा - वापस क्यूं जा रहे हो ?
साहब, पिछले कुछ दिनों से शरीर में कमजोरी महसूस हो रही है, सिर भी दुखता रहता है, घर की याद आती है। इसलिए सोचा कुछ दिन घर रह आऊं।
मैने कहा- जो भी हो, तुम महीने के 15 हजार कमा लेते हो। इसमें से कितना बच जाता है ?
ये सुनके हल्की मुस्कान के साथ उसने कहा, तीन-चार बच जाते हैं। जो घर भिजवा देता हूं।
सिर्फ तीन-चार ! बाकी कहां खर्च करते हो ? मैने पूछा -
साहब, 2000 रहने का किराया, 100 रुपए रोज खाने का, आने-जाने का किराया, साबुन-सर्फ, इन सबमें हो जाते हैं।
ये सब मिला के भी खर्चा पांच-छः हजार से ज्यादा नहीं होना चाहिए। नशा भी करते हो क्या ?
पहले मना किया, फिर कहता है - दिन भर काम करके सारा शरीर टूटने लगता है, नींद नहीं आती। फिर घर की याद भी आने लगती है। ऐसे में यही तो एक सहारा है। और क्या करूं! आप बताइए?
मैंने अपने प्रोफेसर की कही हुई बात दोहराई - "दिल्ली की एक झुग्गी झोंपड़ी में रह रहे रिक्शेवाले और एक अच्छे घर में रहकर, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और खाना देने वाले की महीने की कमाई में ज्यादा फर्क नहीं होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वे उस पैसे को कैसे खर्च कर रहे हैं"
यह सुनकर सतीश कुछ शांत सा हो गया और किसी सोच में पड़ गया। फिर थोड़ी देर बाद पूछता है की, क्या नशा करने से शरीर ज्यादा खराब हो जाता है ? और दिमाग पे भी इसका असर पड़ता है क्या ?
मैने कहा - नशा कोई भी हो, बुरा ही होता है। उसमे भी आप जो देशी शराब पीते हो, ये तो शरीर को पूरी तरह खत्म कर देती है। फिर मजदूरी तो दूर रही, चलने-फिरने लायक भी नहीं रहते। सोचो फिर बच्चों का क्या होगा ??
इसके बाद सतीश नशा छोड़ने की बात कहता है और आंख बंद करके कुछ सोचता हुआ सफर करने लगा।
कुछ देर में ट्रेन मेरे शहर ग्वालियर स्टेशन पर पहुंच गई। मैं उतर गया।
भारत में ऐसे कितने ही सतीश होंगे, जिन्हें नशे से मुक्ति और पैसों के मैनेजमेंट की थोड़ी-बहुत शिक्षा, वर्कशॉप आदि के माध्यम से दे दी जाए तो उनका जीवन स्तर ही बदल जाएगा।
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